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Friday, August 14, 2020

नज़रिया


               हमारी परिस्थितियां ही हमारे नज़रिए का रास्ता तय करती है, वरना एक बच्चा गुब्बारा पाकर खुश होता है तो दूसरा उस गुब्बारे को बेच कर। हर किसी की जिंदगी की अलग कहानी है, कोई सब पाकर भी सुकून ढूंढ रहा है तो किसी को जो मिला उसमें ही सुकून पा लिया। अक्सर लोग कहते है जो होता है अच्छे के लिए होता है, पर जब जीवन में सब बेकार चल रहा हो तो आप चाह कर भी अच्छा नहीं सोच पाते। इसी जगह काम आता है आपका नजरिया, इंसान आधी से जायदा चीज़े सिर्फ़ सोच सोच के बड़ा बना लेता है।

                     एक कहानी से इस तर्क को समझते है, जैसे आजकल अधिकतम लोग वर्क फ्रोम होम पर है। I इसी वर्क फ्रोम होम के चलते,एक पिता अपनी 3 साल की बेटी के साथ ऑफिस का काम निपटाना होता है। जैसे ही वो अपने लैपटॉप पर कुछ काम करते वो नन्ही परी किसी मासूम सवाल के साथ सामने खड़ी मिलती, वो हर बार उसे किसी खिलौने में उलझा देते तो कभी उसे बाद में बताऊंगा कह देते। वो भी रह रह कर अपनी उत्सुकता को सवालों में तब्दील कर फिर लौट आती। तो उसके पापा ने एक तरकीब निकाली के इसे एक ऐसा काम दे देता हूं जिसमें बहुत अधिक समय लगे। 

                   उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक विश्व का मानचित्र बेटी को दिखाया, फिर उसके 8-10 टुकड़े किये और बच्ची को कहा इसे सही तरीके से जोड़ना है और जब जोड़ लो तो मुझे बता देना। उन्हें लगा की अब वो आराम से काम कर सकते है, 2 मिनट बाद ही वो बच्ची हाथ में वो मेप लिए अा गई। उसके पापा देख के हैरान मानचित्र बिल्कुल सही जुड़ा हुआ था। उन्होंने पूछा की इतनी जल्दी कैसे किया ये, तो उस बच्ची ने बड़े प्यार से जवाब दिया के आपने जो मेप फाड़ा था उसके पीछे मैंने एक ड्राइंग की हुई थी तो मैंने वो जोड़ी तो ये अपने आप सही हो गया। उसके पापा उसकी इस सरलता को सुनकर सोच में पड़ गए, और सोचने लगे कितना मुश्किल काम बस नजरिए ने आसान कर दिया। 

         आपको जो 6 दिखाई दे रहा है वो दूसरी तरफ से किसी के लिए 9 भी हो सकता है। इस बात को अगर सीधे शब्दों में कहूं तो जरूरी नहीं के आप अपनी जगह सही हो, तो इस बात से सामने वाला गलत साबित हो जाता है। हम में से ही कुछ लोग हर चीज़ में दिक्कतें देखते है, साथ ही कुछ कहते है जो होता है अच्छे के लिए होता है। आपके नज़रिए से आपका व्यक्तित्व तय होता है, क्युकी कामयाब लोग कुछ अलग नहीं करते। वो उसी काम को अलग तरीके से करते है, उनका नज़रिया बाकियों से अलग होता है। 

                   बात बहुत सरल है अगर समझे तो, आपके नज़रिए का सकारात्मक और नकारात्मक होना आपकी बहुत सी परेशानियों का हल भी हो सकता है और उसके कारण परेशानी भी ही सकती है। उसके लिए बहुत जरूरी है के आप अपने दिमाग को कैसे सीखा रहे है, तो थोड़ा खुद पर भी वक़्त खर्च कीजिए। अपने आप को बेहतर बनाते रहे क्युकी आपका शरीर और आपका दिमाग ही आपकी असली जायदाद है, सोचना इस बारे में थोड़ा जरूरी है.........
     
           
:- 🖋 मनीष पुंडीर 

Sunday, August 9, 2020

दुनियां हमसे कुछ बेहतर चाहती है.....

         
                                 आज के इस वक़्त में इंसान बदलाव तो चाहता है, पर ख़ुद को बदलना नहीं चाहता. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे सबको जाना स्वर्ग है, बस मरना कोई नहीं चाहता. एक जगह मैंने एक चीज़ पढ़ी थी आपके साथ भी बांट रहा हूं, जब सतयुग था तो अच्छाई और बुराई दोनों अलग अलग लोक में हुआ करती थी, अच्छे आदमी देव कहलाते थे और बुरे असुर इन्हीं से बना था देवलोक और असुरलोक. उसके बाद त्रेता युग की बात करे जिसमें अच्छाई और बुराई एक ही समाज का हिस्सा थे जैसे राम और रावण, फिर द्वापर युग आया जिसमें अच्छाई और बुराई एक ही कुटुंब का हिस्सा थे जैसे कौरव और पांडव। 

                                 अब आज के युग की बात करें तो ये है कलयुग अच्छाई और बुराई अब एक ही शरीर में है, यानी हम सबके अंदर और हम इस सच से भाग नहीं सकते। ये सब बताने की वज़ह जो है वो ये है की दुनियां में अच्छाई की कमी होती जा रही है, आप सिर्फ़ ये सोच के गलत करते है के सिर्फ़ मेरे अच्छा करने से क्या होगा?? तो दोस्त आप अपना योगदान तो दो बाकी अपना करेंगे। 

                                 आपकी इस छोटी छोटी अनदेखी से जाने कितने बड़े बड़े नुकसान होते है, आईए इसे और सरल तरीके से समझते है। इसमें आपका कूड़ा खुले में फेकना, नदी तालाब में गंदगी करना, किसी से धर्म - रंग - जाती आदि के आधार पर भेदभाव, सिर्फ़ अपने मज़े के लिए किसी इंसान या जानवर को परेशान करना और बहुत से काम शामिल है। वैसे आपने कभी इस बारे में सोचा है कि आपका फेका एक पॉलीथिन का टुकड़ा किस गाय-कुते या किसी मछली कि जिंदगी छीन सकता है, आपका उड़ाया मज़ाक या तो किसी को डिप्रेशन में कर सकता है या फिर उसे हिंसक प्रवृति का बना सकता है। 

                            अभी कुछ दिन पहले एक वीडियो काफ़ी वायरल हो रहा था जिसमें एक लड़की का स्कूटी पर ऐक्सिडेंट हुआ है और वो उसके सर से खून बह रहा है, सड़क पर लोग आ जा रहे है पर कोई उसे नहीं उठा रहा. फिर दो लोग आते है जो किसी मीडिया के थे वो भी उस लड़की का वीडियो बना रहे है अपने कैमरे से पर उसकी मदद नहीं की वो दर्द से छटपटा रही थी. साथ ही जिसने ये सारा वीडियो बनाया वो भी नहीं गया मदद करने, वो सिर्फ़ ये वीडियो बना के सोशल मीडिया पर डाल के खुद को फेमस करने के प्रयास में था। क्या सच में यही इंसानियत है ????? 

                                    बातें सब अच्छी अच्छी करते है, समाज में बढ़ती बुराइयों के बारे में। होता क्या है फिर???  मुझे नहीं पता आपमें से कितने लोग इस बात पर भरोसा करते है की इस संसार में सब चीज़े एक दूसरे से जुड़ी होती है, आपके किए कार्य ही आपके जीवन में अच्छे बुरे का संतुलन बनाते है। आपने अक्सर बड़े बूढों को कहते सुना होगा इंसान के कर्म ही आगे आते है, ये बात कितनी सच है ये सब हम जानते है। 

                                      आपका व्यवहार आपकी परवरिश दर्शाता है, आपकी आने वाली पीढ़ी भी आपको देख कर ही सीखेगी। आपको अच्छे बेहतर कल के लिए आज ही कोशिश करनी होगी, अपने लिए अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए। पर सवाल ये है की उस पीढ़ी को अच्छा सिखाने के लिए हम कितने सजग है?? विचार कीजिएगा कही देर न हो जाए..........

आखिर में कबीर के एक दोहे के साथ आप लोगों पर छोड़ता हूं की आप इस बात को कैसे लेते है। 

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, 
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

धन्यवाद 

:- 🖋️ मनीष पुंडीर 


Tuesday, August 4, 2020

अंदर का ज्वालामुखी....


                    हम सब अपनी जिंदगी बेहतर करने में लगे है, अपने लिए अपनों के लिए। न जाने कितने लोग मेरे साथ सहमत होंगे पर कभी कभी ज़िम्मेदारियों और ख्वाइशों के तराज़ू को बराबर करते करते आप एक वक़्त पर आकर टूट जाते हो। जब आप सब कुछ ठीक करने में लगे होते ही पर कुछ भी ठीक नहीं हो रहा होता, बिल्कुल वैसा एहसास जब आप रस्सी के दो छोर पकड़ के पास लाने की कोशिशें करते रहते हो पर वो एक दूसरे से अलग जा रहे होते है। 

                   अच्छे बने रहना भी आसान नहीं है, आप कभी कभी अच्छे बन कर भी थक जाते हो। जब हर बार आपकी सरलता को लोग बेवकूफी समझने लगते है, तो आप फिर ख़ुद से ही चिड़ने लगते हो की क्यों हूं मै ऐसा ???.  वो भाव आप किसी के साथ बांट नहीं सकते, कोशिश भी करोगे तो सामने वाला उसे उसी तरह समझे ये न के बराबर संभावनाएं होती है। 

                  अच्छे लोगों की आदत होती है उन्हें हंसते चहरे देखना अच्छा लगता है, किसी की खुशी के लिए अगर उन्हें कभी अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर भी जाना पड़े तो वो जाते है। पर मतभेद तब शुरू होते है जब उन्हें उनके इस काम के लिए बाध्य समझा जाता है, और सामने वाला उसकी आदत डाल लेता है। 

                  हर कोई चालाकी समझता है इसलिए हम इंसान है, सब सच्चे होते तो हम जानवर होते। आपको नहीं लगता आधी जिंदगी तो हम सिर्फ़,  अपनी बात सही साबित करने के लिए लड़ते रहते है। भले उस बीच के समय में बाकी चीज़े बिगड़ी रहे, क्या आखिर में सच में आपकी जीत होती है ???

                 कितना मुश्किल है ये समझना???  के दो लोगों की बीच बातों से जायदा खमोशी चुबती है। उनमें से एक कोशिश कर कर के थक जाता है, बाकी दूसरा उसे हार जीत का खेल समझे बैठा है। हर इंसान के अंदर एक ज्वालामुखी है जो ख्यालों के लावे से भरा है, वो ख़्याल जो उसे डराते है उसकी नाकामी से..... उसके अपनों से दूर होने से.... वो ख्याल जिसमें वो चिल्ला चिल्ला के रोना तो चाहता है पर वो भी नहीं कर सकता..... वो ख़्याल जो रोज़ तकिए पर उसके साथ रात घंटो बातें करते है।  

                  दिक्कत सारी उस इमोश्नल फूल मन की है जो दूसरों को रोते नहीं देख सकता, पर साला खुद भी किसी के सामने नहीं रो सकता। जरूरी नहीं जो इंसान हमेशा हंसता है वो अंदर से खुश हो, अक्सर दिया तले ही सबसे जायदा अंधेरा होता है। सबको अपनी कहनी तो है पर सिर्फ़ अपनी कहनी है, कोई किसी की सुनना नहीं चाहता। 

                 कुछ चुनिंदा लोग आज भी है जो एक इमोशनल सीन देख के रोने लगते है, जिन्हें लोगों के एहसासों से असल में फ़र्क पड़ता है। जो इस सभ्य समाज का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जो लोगों को रंग रूप, धर्म जात, हैसियत और औक़त के मापदंडों में नहीं तोलते। पर ये भी सच है के सबसे जायदा इन्हीं लोगों में ये ज्वालामुखी पाया जाता है। 

                   कभी सोचा है उस ज्वालामुखी का अंत क्या होता है ??. ये ख़्याल मैं आप पर छोड़ता हूं क्युकी हम में से ही कोई उस अंदर के ज्वालामुखी को पाले बैठा है, या हम में से ही कोई उसकी वजह भी है मानों या न मानों.... 

 
:- 🖋 मनीष पुंडीर  

Sunday, August 2, 2020

दोस्ती


                             वैसे में आपको पहले बता चुका हूं के रिश्ते किसी भी ख़ास दिन का मोहताज नहीं होते, पर एक रिश्ता है जो हम खुद चुनते है। उस एक रिश्ते से आपकी पूरी जिंदगी ख़ास हो जाती है, वो है "दोस्ती" l बाकी रिश्तों की तरह इसके कोई तय मायने नहीं होते, न ही ये किसी औपचारिकता के बन्धन में बंधा होता है। बचपन से ही हम अपने दोस्तों को चुनना शुरू कर देते है, ये कही कोई सिखाता नहीं है किसी का साथ अच्छा लगता है और वो आपका दोस्त हो जाता है।

                    ये वो रिश्ता है जिसमें आप अनेक किरदार जीते हो, आप टॉम एंड जेरी की तरह लड़ते भी हो.....  आप किशन सुदामा की तरह एक दूसरे के लिए रोते भी हो..... कभी एक दूसरे की खामोशी भी समझते हो और कभी एक दूसरे को फटकार भी लगाते हो। दोस्त वो है जो मुसीबत में आपका मज़ाक भी उड़ाता है, और उसी मुसीबत से आपको बाहर निकालने में मदद भी करेगा। 
                 
               वैसे दोस्ती भी एक तरह का प्रेम ही है, क्युकी आप उसे भी खोना नहीं चाहते। आप सबके पास अपने दोस्तों से जुड़ी यादें होंगी, पर सिर्फ़ साथ हसना दोस्ती नहीं है दोस्त तो वो होता है जिसके सामने आप खुल के रो सको। हम असल में दोस्तों के सामने ही सच्चे होते है, बाकी वक़्त तो हम सिर्फ़ इस सभ्य समाज को दिखाने को जी रहे होते है। 

                  ये ज़रूरी नहीं आपको इसके लिए कहीं दूर जाना पड़े, दोस्ती किसी से भी ही सकती है।वो आपके परिवार में से हो या फ़िर पड़ोस से, कोई भी जो आपको समझता है आपका अच्छा दोस्त हो सकता है। सरल शब्दों में कहूं तो, जहां झिझक ख़त्म हो जाती है वहीं दोस्ती शुरू होती है।वक़्त के साथ ये दोस्ती बढ़ती है, उस दौरान हम यादें बनाते है।वो कहते है ना एक साल में 10 नए दोस्त बनाना अच्छी बात है, पर दस साल तक एक ही दोस्त बनाए रखना ख़ास है। उसी ख़ास को सम्भाल कर रखे क्युकी आपकी समझदारी में साथ हर कोई देगा, पर आपकी बेवकूफियों में जो साथ दे वही तो दोस्त है। 

                         आजकल लोगों में इस रिश्ते में शिकायते ढूंढ ली है, जब वो याद नहीं करता तो मैं क्यों??. ऐसा नहीं लोग निभाना तो चाहते है पर  सिर्फ़ अपनी शर्तों पर, जैसा मैंने पहले ही लिखा था इस रिश्ते में शर्तें नहीं होती। कोई इतना व्यस्त नहीं होता के किसी के लिए टाइम न निकाल सके, ये सब सहुलियत और प्राथमिकता वाली बात है।तो इस आदत को बदले और जी दोस्त से जब भी मिले दिल खोल के मिले, ताकि वो यादें बनाने का सिलसिला ख़त्म न हो।   


:- 🖋  मनीष पुंडीर 

Wednesday, July 29, 2020

कोरोना या डर ??????

 
                                              एक सच्ची कहानी मेरे एक दोस्त की नाम नहीं बताऊंगा क्युकी अक्सर लोग नाम के साथ एक छवि बना लेते है जो धर्म और जात से रंगो से बनी होती है। ये सिर्फ उसकी नहीं ऐसे लाखों लोगों की कहानी है जो डर के साए में जी रहे है, जो रोज़ घर से बाहर कदम रखने से पहले उपर वाले से यही दुआ करते है की बचा लेना। पर घर चलाने के लिए कमाना भी जरूरी है उसके लिए घर से निकलना ही पड़ेगा, आप भूक सहन कर सकते है क्युकी आपको पता है कोरोना क्या है पर आपके बच्चों को नहीं पता। 
   
                       तो मेरा दोस्त हर दिन की तरह घर से ऑफिस के लिए निकला भाभी ने उसे टिफिन दिया और उसके अपने छोटे बेटे जो अभी 6 महीने का है उसका माथा चूमा और निकल गया। वहा जाकर पता चला के ऑफिस में एक साथ के काम करने वाले आदमी को कोरोना पोजिटिव निकला है, वो थोड़ा असमंजस में था उसके सामने वो सारी खबरें आंकड़े चलने लगे थे जो उसने मीडिया में देखे थे। खेर उस आदमी को कोरेंटाइन के लिए भेज दिया गया। उसके बाद सब पहले जैसा ही चल रहा था, एक आधी बार बात भी उठी के बाकियों का भी चेकप करवा लेते है पर सब फिट महसूस कर रहे थे तो नहीं करवाया। एक हफ्ते बाद एक और केस आया फिर अब लोगों मे आपस मे कानाफूसी होने लगी, फिर एक जुट होकर सबने टेस्ट करवाए फिर जब रिजल्ट आया तो सिर्फ मेरा दोस्त पाज़िटिव नीकला बाकी सब नेगटिव। उसे रिपोर्ट आते ही घर भेज दिया गया और कहा गया जब तक कॉल न करे आप ऑफिस मत आईएगा। 

                                    वो बेमन घर लौटा. रास्ते मे उन सारे अहसासों को एक साथ महसूस कर रहा था कभी ये ख्याल आता की मै तो ठीक हु फिर मुझे क्यू हुआ ??? , तो कभी ये सोचने लगता की कही एसी जगह चला जाऊ जहा कोई न हो, कुछ ख्याल तो इतने डरावने थे के अगर मेरी वजह से मेरे बच्चों को ये सब हुआ तो खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा, अब नौकरी बचेगी के नहीं ???, मै जिंदा तो रहूँगा न.. मुझे जीना है अपने लिए.... अपनों के लिए। उस एक कागज के टुकड़े ने एक खुसमिज़ाज आदमी को उसकी मौत सोचने पर मजबूर कर दिया, उसने अपनेआप को इतना लाचार कभी महसूस नहीं किया था। 

                                 किसी तरह भारी कदमों के साथ घर पहुच गया और सीधा बिना किसी से बात किए ऊपर वाले कमरे मे जाकर खुद को बंद कर लिया. घरवालों को उसी बंद कमरे से बताया के क्या हो गया उसके साथ,बच्चे उसके सामने ही पापा पापा कर रहे थे पर वो उन्हे मिल नहीं सकता था। कुछ देर बाद ऑफिस वालों का फोन आया उसे अस्पताल ले जाने की बात कही गई पर उसने कहा मै तो ठीक हु मुझे होम कोरेंटाइन रहने दो, काफी वाद-विवाद के बाद वो लोग मान गए। फिर शुरू हुआ डर का सिलसिला रोज टीवी पर सोशल मीडिया पर बढ़ते केस और मौतों की खबरे उसकी जीने के जज्बे को कम करते जा रहे थे, वो तन से तो ठीक था पर मन से बीमार था डरा हुआ था। उस डर की वजह कोरोना नहीं था वो डर लाचार होने का था, वो डर परिवार के लिए था, वो डर इसलिए भी था के अब आगे लोगों का नजरिया उसके लीये बदल जाएगा। 

                                        किसी भी अन्नोन नंबर से अगर कॉल आता था तो वो सहम जाता था कही उसे कोई हॉस्पिटल ले जाने तो नहीं अ रहा, वो एहसास बहुत बुरा था कुछ इस तरह का की आप अपने दुश्मनों को भी उसके न होने की पार्थना करोगे। वो इस बात से हैरान था के मै ठीक हु फिर भी उसने जानने के लिए गूगल किया, उससे भी कुछ हाथ नहीं लगा।  वह ये और  पढ़ लिया के 80 % मामलों मे insano को कुछ पता भी नहीं चलता के उसे कुछ हुआ भी है, पर अब ये भी सच ही के वायरस है और लोग उसे बीमार भी है पर इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं के जिसको हुआ वो जिंदा नहीं बचेगा। आजकल लोगों को कोरोना नहीं उसका डर मार रहा है, इतने भी हालात खराब नहीं होते जितने लोगों ने सोच सोच के दिमाग मे बना लिए है। 
                                   कहने मे आसान है के हमे बीमारी से लड़ना है बीमार से नहीं पर असल मे कहानी अलग है, रेपोर्ट्स के मुताबिक बुजुर्ग या जिन लोगों को पहले से अस्थमा, मधुमेह , हार्ट और किडनी  की बीमारी है उनके मामले में ख़तरा गंभीर हो सकता है। दूसरी ओर लोग भूकमरी से अधिक परेशान है, लोगों की नौकरी चली गई है और तो और जो काम पर है उन्हे पूरी तनख्वा भी नहीं मिल रही। अपनी सतर्कता ही इसका बचाव है इसके लिए मास्क पहने रखे, सेनेटाइज़र साथ रखे, बाकी इस बारे मे आप बहुत कुछ वैसे भी सुनते रहते है। मेरा दोस्त आज भी स्वस्थ है पर वो डर खत्म करने के लिए खुद को बंद किए बैठा है, हफ्ता भर और अलग रहेगा कल की बात हुई दिल की तस्सलि भी जरूरी है।
 
                                      इस सब मामले मे हमारा दिमाग बिल्कुल वैसे ही काम करता है जैसे इग्ज़ैम हाल मे जब पेपर हाथ मे आता है अगर हमे पता है के ये सब जो भी पुछा है आता है तो खुशी होती पर उसके उलट अगर कुछ नहीं आता तो फिर लगता है डर, आपका बार बार पाव हिलना.... हाथों मे पसीना आना..  ... गला बार बार सुखना ये सब कुछ निशानी है और अगर वो डर हावी हुआ तो आप बेहोश भी हो सकते है। यही बात कोरोना के लिए लागू होती है किसी को पूरी तरह पता नहीं है के ये है क्या??? तो खुद को डराओ मत और सावधानी रखो वो आपके हाथ मे है बाकी जो आपके हाथ मे नहीं है उसके लिए परेशान होने का क्या मतलब ?????


                       ( एक गुजारिश है,दूसरों के दुविधा सुनने के लिए हमेशा खुले रहो। ऐसे मत रहो की किसी को आपसे कुछ बात कहने के लिए दो बार सोचना पड़े। मेंटल हेलथ भी एक बहुत जरूरी चीज है कोई अपनी मर्जी से अकेला नहीं रहना चाहता, सबको साथ पसंद होता है किसी दोस्त का.. परिवार का किसी ऐसे का जिसे वो दिल की बात बता सके और उसे पता हो के वो आपकी बातों से आपको किसी अच्छे - बुरे के तराजू मे नहीं तोलेंगे)

:- 🖋 मनीष पुंडीर 

Tuesday, July 28, 2020

अनुभव करो..


                   आजकल लोगों में आक्रोश बहुत है, उसकी वजह से उनका नज़रिया जो हर चीज़ को हार जीत में तोलने लगता है। ये सबको पता है कि किसी कंपनी में अगर आपको अच्छी पोस्ट चाइए, तो आपको एक चीज़ बहुत जरूरी चाइए वो है "अनुभव"। अनुभव तभी आता है जब आप सीखने की इच्छा से चीजों को करते है और गलतियों नहीं दोहराते, पर आजकल वो अनुभव करने वाला चलन बदल के हार-जीत वाला हो गया है।
                       
                             लोगों में सब्र है ही नहीं, सबको एक दिन में तरक्की चाइए। कुछ कमयाबी के लिए खुद को बेच देते है, कुछ इसलिए कामयाब नहीं है क्युकी वो बिकना नहीं चाहते। सब किसी ना किसी की तरह बनना चाहते है पर कोई ख़ुद को खोजना ही नहीं चाहता, दूसरों की सोच अपने दिमाग में रखके क्या मिलेगा ??? 

                             आजकल लोगों को कामयाब से जायदा फेमस होना है, जाने क्या होड़ लगी है सबको अटेंशन चाइए। एक बात याद रखना उम्र का अक्ल से कोई लेना देना नहीं है, मैच्योरिटी उम्र के साथ नहीं जीवन के अनुभवों के साथ ही आती है।ये सब बातें सिर्फ़ इसलिए बता रहा हूं ताकि आप अनुभव करना सीखो, वो और कोई नहीं करेगा आपको आपके लिए खुद करना पड़ेगा। ये बिल्कुल वैसा ही के जैसे आप पहली बार यूट्यूब से देख के कुछ बना रहे हो और वो पहली बार में ही बेहतरीन बन जाए बाकियों के लिए शायद वो आम बात होगी पर उस एहसास को आपके इलावा और कोई अनुभव नहीं कर सकता।
             
                            अनुभव किसी किताब से नहीं आयेगा और न ही इसका कोई कोर्स है, बारिश की बूंद को महसूस किया है कभी??? वो मिट्टी की खुशबु....... वो स्कूल से लौट के आना और आपके पसंदीदा राजमा की महक आपके नाक के रस्ते पेट में उत्तर जाती थी.....  वो दोस्तों ने जब पहली बार पिलाई थी फिर दो चार पेग खींचने के बाद अगले दिन ही सुद अायी थी। अनुभव करना इसलिए भी जरूरी है जीवन में क्युकी ये आपको, आपके विचारों को व्यक्त करने की ताक़त देता है। 
  
                                  इतना भी क्या कंजुसी करना जीने में???  मरना सबको है और ये भी नहीं पता कौन कबतक साथ है। तो हर चीज अनुभव करो यादों की भी तिजोरी भरते रहो, बाकी किसी की जिदंगी में आप क्या थे वो मायने नहीं रखता खुद की कहानी के हीरो बने रहना। जब एहसासों को जीना सीख जाओगे तो कसम से बता रहा हूं, गाने की एक लाईन से लेकर आसमान के आए बादल तक में खुशी ढूंढ लोगे। 


:-🖋 मनीष पुंडीर 

मैं श्रेष्ठ हूं

            अगर आपको अपनी आस्था पर भरोसा है और आप यह यकीन रखते हैं कि आपके किए गए अच्छे कर्म आपको पलट कर मिलेंगे, और आपने हर प्र...