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Saturday, February 6, 2021

आत्मसंदेह



              ये शब्द सुनने में अजीब लग रहा होगा पर ये हमारे साथ हर वक्त साथ रहता हैं, सबके घर में कुछ ऐसी चीजें सिखाई जाती हैं कि हमें खुद पर संदेह होने लगता कि हम सही हैं या गलत। आप में से कुछ इससे अंधविश्वास से जोड़ कर भी देख सकते हैं, जैसे आपने पूजा करने को दिया जलाया और वो थोड़ी देर बाद बुझ गया जब की उसमें तेल की मात्रा भी पर्याप्त थी। तो आपको घरवालों से सुनने को मिलता हैं तूने मन से नहीं जलाया होगा, इस पर आप खुद के बारे में अंतर् मन में बात करते हैं क्या सच में ??? ऐसा कुछ है या ये महज़ एक सामान्य बात है।

     आत्मसंदेह जन्म देता हैं आत्ममंथन को जो आपके बहुत सारे प्रश्नों का उत्तर पाने में आपकी सहायता करता हैं।हर कोई अपनी कहानी में हीरो होना चाहता हैं,पर असल में वो कितना उस पर खरा उतरता हैं यही मंथन का विषय हैं। ये मंथन आपको एक नजरिया देता हैं जिसमें आपको ये समझ आने लगता हैं कि कौन से वो पक्ष हैं जिन पर आपको ध्यान देना हैं।आप जाने अनजाने ये आत्मसंदेह करते हैं, अपने मन में दूसरों से तुलना करके या जब चीज़े आपके विपरीत जा रही हो। 

          कुछ घरों में आपकी छींक से भी आपको अच्छा बुरा आंका जाता हैं,कभी किसी नए काम कर बारे में बात हो और आप छींक दो तो सबका ध्यान आपकी तरफ़ ही केंद्रित हो जाता हैं। हमारा मन ही इन चीज़ों को बढ़ावा देता हैं,आप खुद को ही आंकते रहते हैं की मैं इन मापदंडों पर खरा उतरता हूं की नहीं। आत्मसंदेह अच्छा बुरा दोनों हो सकता हैं वो सब आप पर निर्भर हैं कि आप उसे कैसे लेते हैं।कुछ इस बात पर यकीन कर लेते हैं कि हम ही शायद बदनसीब हैं। दूसरी ओर बाकी खुद को ही चुनौती देते हैं नहीं हम इस सोच को बद लेंगे, आखिर में जब वो उस संदेह को पार पा लेते हैं तो और बेहतर महसूस करते हैं।

          आखिर में इतना कहूंगा आत्मसंदेह आपको मंथन करवाएं तो अच्छा हैं पर इसके विपरीत आप खुद पर इसे हावी होने देंगे तो फिर आप मानसिक तौर पर कमज़ोर होते रहेंगे।

Friday, December 25, 2020

ख़ुशी का तराज़ू।

ख़ुशी का तराज़ू....

 दिल को कहां सोचना आता है??
 वो तो बस प्यार चाहता है,
 फ़र्क फितरत का ही तो है वरना,
 कितना मुश्किल है मासूमियत बनाए रखना??

कितनी महंगी होती है खुशियां ??
इस सवाल के सबके अपने मुताबिक जवाब है...
वो जो आपके लिए फ़ालतू हो,
आज भी शायद वो कुछ किसी के लिए  ख़्वाब है।

क्यों नापतोल करना खुशी में,
पैसा लगता है क्या बेफिक्र हंसी में??
सर्दी में धूप की गरमाहट,
मां के कदमों की आहट..
नमकीन से मूंगफली चुन के खाना, 
नहाते वक्त गाना गुनगुना...
ढूंढने निकलोगे तो हज़ार वजह है,
वरना लोग खुश होने के लिए....
आज भी सही वक्त के इंतज़ार में लगे है।

Tuesday, August 18, 2020

आपकी सोच- वरदान या बोझ ???


                       इस समाज में कुछ भी जो नया किया जाता है, उसके लिए सहमति की ज़रूरत होती है। जैसे कोई नहीं डिश बनाई तो कैसी बनी उसपर घरवालों की सहमति, कपड़े खरीदते वक़्त ये अच्छा या वो अच्छा उसपर दोस्तों की सहमति। धीरे -धीरे ये आपकी आदत में बदल जाता है, इसके चलते हम उन चीजों की भी आदत डाल लेते है जिनके हम कभी ख़िलाफ़ हुआ करते थे। 

               
                        अगर पूरे दिन की बात करू तो हमारे सामने रोज़ टीवी पर मोबाईल पर कुछ ना कुछ ऐसा परोसा जा रहा है, जिसे हम अनदेखा कर रहे है पर वो साथ ही साथ हमारे दिमाग़ में एक सोच उत्पन्न कर रहा है। वो सोच जो काले गोरे में फ़र्क करती है, वो सोच जो लड़कियों को एक वस्तु की भांति दर्शाती है। ये एड नहीं आपकी सोच पर प्रहार है, जो रोज़ रोज़ आपके दिमाग में घर कर रहा है। रेप की ख़बरें पहले से तीन गुना हो गई है पर आपकी चिंता उसके लिए उतनी ही कम कम, मानों अब आप उसे रोज़ सुनते है तो जैसे आपने उसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा मान लिया है।  

                    किसी भी गलत चीज़ का लगातार होना उसे किसी भी तरह से स्वीकार करने योग्य नहीं बनाता, हां उस गलत ही आदत ज़रूर पड़ जाती है। लोगों में खुद की कोई विचारधारा रही ही नहीं, आज का आदमी पूरे दिन टीवी और सोशल मीडिया का कचड़ा दिमाग में भर के ज्ञान दे सकता है। ये बिल्कुल वैसा ही है कि आपके पास कोई ऐसा मैसेज आया जो की किसी धर्म समुदाय या व्यक्ति विशेष की निंदा पर है, आपने उसे आगे 10 लोगों को भेज अपनी सहमति से उस खेल में अपनी भागेदारी देदी। 

                        आइए इसे अब सरल भाषा में समझते है, रोज़ आप टीवी पर काले से गोरा होने के एड देखते रहते है और वही कोई सैनिटरी पेड का एड आ  जाए तो आप रिमोट ढूंढ रहे होते हो। मतलब एक जगह तो आप खुद के प्राकृतिक रंग को बदलने में लगे और और दूसरी ओर उन्हीं की प्राकृतिक समस्या पर शर्म का भाव क्यों??? ये दोगलापन आजकल आम हो चला है। 

                       धर्म जो की एक बहुत सवेदंशील मामला है उस पर आजकल क्या क्या कहते बोलते है लोग ये किसी से छुपा नहीं है, अगर आप उन बोलने वालों में नहीं है तो अच्छी बात है पर आप उसे सुनकर भी उतने ही भागीदार बन रहे है। आपको पता है दुनिया में सबसे अधिक त्यौहार हमारे देश में मनाए जाते है, हालात उतने ख़राब नहीं जीतने आपको मीडिया के माध्यम से दिखाए जाते है। बात सीधी ये भी है कि अगर आप किसी के लिए बुरा कह रहे है तो बुरा सुनने के लिए भी तैयार रहे, पर होता क्या है आप तक किसी एक पक्ष की बाते इस तरीके से रखी जाती है कि दूसरा पक्ष अपने आप गलत साबित हो जाता है। 

                              डिबेट शो के नाम पर बकवास करना आजकल चलन में है, वहीं हर दूसरी वेब सीरीज में नाम पर नाजायज रिश्ते, अश्लीलता को दिखाया जा रहा है। बनाने वाले को दोष क्या दे?? जब देखने वाले ही हम है, ये सब तब तक चलता रहेगा जब तक हम इसे अपनाना बंद नहीं करेंगे। आप चाहे तो इसे  बढ़ा भी सकते है और बिगाड़ भी, बस इसी मुहिम में आपका साथ चाहता हूं। इसे तरक्की कहे या दुर्भाग्य आज का युवा सनी लियोनी को तो जानते है पर, शायद हिमा दास के लिए आप में से कईयों को गूगल करना पड़े। 

                               अगर कोई भी आपको ये सीखा रहा है कि अपने धर्म, जाति  और समुदाय को अच्छा दिखाने के लिए, दूसरे की बुराई जरूरी है तो आप गलत जगह है। प्रकृति से सीखो सूरज - चांद सबके लिए एक है,एक हवा पानी.....एक ही अनाज..... किसी का नुकसान करके आपकी तरक्की कभी मुमकिन नहीं, ये याद रखना। मसला ये है के गरीब आदमी अपनी रोज़ी रोटी में ही इतना मशगूल रहता है कि उसे इस सबसे कोई लेना देना नहीं, ये जो पढ़ा लिखा अधिक सभ्य वर्ग है उनकी ये समस्या अधिक है।  
               
                                फर्ज़ कीजिए आपके घर में सांप का बच्चा मिला अपने उसे ये सोच के नहीं भगाया कि   बच्चा है क्या करेगा, एक दिन वही इतना बड़ा हो गया कि उसने आपको काटा और आप उसके ज़हर से मर गए। इसी उदाहरण को यदि हम अपने आप से जोड़े  तो जिन 
छोटी छोटी बातों को अभी नजरअंदाज कर रहे है कल वहीं हमारे लिए नुक़सान दायक होंगी, जितनी जल्दी इस खेल को समझोगे उतना सबके लिए अच्छा है।

                           अंत में यही कहूंगा ये मीडिया आपके लिए जरूरी नहीं आप उसके लिए जरूरी हो, इन्टरनेट एक ऐसी दुकान जैसा है जिसमें आपको अच्छा और बुरा दोनों सामान मिलेगा अब वो आप पर है कि आप उससे लेना क्या चाहते है?? जब आप अपनी पसंद ना पसंद को लेकर सजग रह सकते है, तो मीडिया के प्रति आपकी सहमति भी इसी तरह होनी चाइए आपको पता होना चाहिए कि जिस चीज़ को बढ़ावा दे रहे है वो असल में क्या असर डालेगी ?? 

 :- 🖋️ मनीष पुंडीर 

Friday, August 14, 2020

नज़रिया


               हमारी परिस्थितियां ही हमारे नज़रिए का रास्ता तय करती है, वरना एक बच्चा गुब्बारा पाकर खुश होता है तो दूसरा उस गुब्बारे को बेच कर। हर किसी की जिंदगी की अलग कहानी है, कोई सब पाकर भी सुकून ढूंढ रहा है तो किसी को जो मिला उसमें ही सुकून पा लिया। अक्सर लोग कहते है जो होता है अच्छे के लिए होता है, पर जब जीवन में सब बेकार चल रहा हो तो आप चाह कर भी अच्छा नहीं सोच पाते। इसी जगह काम आता है आपका नजरिया, इंसान आधी से जायदा चीज़े सिर्फ़ सोच सोच के बड़ा बना लेता है।

                     एक कहानी से इस तर्क को समझते है, जैसे आजकल अधिकतम लोग वर्क फ्रोम होम पर है। I इसी वर्क फ्रोम होम के चलते,एक पिता अपनी 3 साल की बेटी के साथ ऑफिस का काम निपटाना होता है। जैसे ही वो अपने लैपटॉप पर कुछ काम करते वो नन्ही परी किसी मासूम सवाल के साथ सामने खड़ी मिलती, वो हर बार उसे किसी खिलौने में उलझा देते तो कभी उसे बाद में बताऊंगा कह देते। वो भी रह रह कर अपनी उत्सुकता को सवालों में तब्दील कर फिर लौट आती। तो उसके पापा ने एक तरकीब निकाली के इसे एक ऐसा काम दे देता हूं जिसमें बहुत अधिक समय लगे। 

                   उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक विश्व का मानचित्र बेटी को दिखाया, फिर उसके 8-10 टुकड़े किये और बच्ची को कहा इसे सही तरीके से जोड़ना है और जब जोड़ लो तो मुझे बता देना। उन्हें लगा की अब वो आराम से काम कर सकते है, 2 मिनट बाद ही वो बच्ची हाथ में वो मेप लिए अा गई। उसके पापा देख के हैरान मानचित्र बिल्कुल सही जुड़ा हुआ था। उन्होंने पूछा की इतनी जल्दी कैसे किया ये, तो उस बच्ची ने बड़े प्यार से जवाब दिया के आपने जो मेप फाड़ा था उसके पीछे मैंने एक ड्राइंग की हुई थी तो मैंने वो जोड़ी तो ये अपने आप सही हो गया। उसके पापा उसकी इस सरलता को सुनकर सोच में पड़ गए, और सोचने लगे कितना मुश्किल काम बस नजरिए ने आसान कर दिया। 

         आपको जो 6 दिखाई दे रहा है वो दूसरी तरफ से किसी के लिए 9 भी हो सकता है। इस बात को अगर सीधे शब्दों में कहूं तो जरूरी नहीं के आप अपनी जगह सही हो, तो इस बात से सामने वाला गलत साबित हो जाता है। हम में से ही कुछ लोग हर चीज़ में दिक्कतें देखते है, साथ ही कुछ कहते है जो होता है अच्छे के लिए होता है। आपके नज़रिए से आपका व्यक्तित्व तय होता है, क्युकी कामयाब लोग कुछ अलग नहीं करते। वो उसी काम को अलग तरीके से करते है, उनका नज़रिया बाकियों से अलग होता है। 

                   बात बहुत सरल है अगर समझे तो, आपके नज़रिए का सकारात्मक और नकारात्मक होना आपकी बहुत सी परेशानियों का हल भी हो सकता है और उसके कारण परेशानी भी ही सकती है। उसके लिए बहुत जरूरी है के आप अपने दिमाग को कैसे सीखा रहे है, तो थोड़ा खुद पर भी वक़्त खर्च कीजिए। अपने आप को बेहतर बनाते रहे क्युकी आपका शरीर और आपका दिमाग ही आपकी असली जायदाद है, सोचना इस बारे में थोड़ा जरूरी है.........
     
           
:- 🖋 मनीष पुंडीर 

Sunday, August 9, 2020

दुनियां हमसे कुछ बेहतर चाहती है.....

         
                                 आज के इस वक़्त में इंसान बदलाव तो चाहता है, पर ख़ुद को बदलना नहीं चाहता. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे सबको जाना स्वर्ग है, बस मरना कोई नहीं चाहता. एक जगह मैंने एक चीज़ पढ़ी थी आपके साथ भी बांट रहा हूं, जब सतयुग था तो अच्छाई और बुराई दोनों अलग अलग लोक में हुआ करती थी, अच्छे आदमी देव कहलाते थे और बुरे असुर इन्हीं से बना था देवलोक और असुरलोक. उसके बाद त्रेता युग की बात करे जिसमें अच्छाई और बुराई एक ही समाज का हिस्सा थे जैसे राम और रावण, फिर द्वापर युग आया जिसमें अच्छाई और बुराई एक ही कुटुंब का हिस्सा थे जैसे कौरव और पांडव। 

                                 अब आज के युग की बात करें तो ये है कलयुग अच्छाई और बुराई अब एक ही शरीर में है, यानी हम सबके अंदर और हम इस सच से भाग नहीं सकते। ये सब बताने की वज़ह जो है वो ये है की दुनियां में अच्छाई की कमी होती जा रही है, आप सिर्फ़ ये सोच के गलत करते है के सिर्फ़ मेरे अच्छा करने से क्या होगा?? तो दोस्त आप अपना योगदान तो दो बाकी अपना करेंगे। 

                                 आपकी इस छोटी छोटी अनदेखी से जाने कितने बड़े बड़े नुकसान होते है, आईए इसे और सरल तरीके से समझते है। इसमें आपका कूड़ा खुले में फेकना, नदी तालाब में गंदगी करना, किसी से धर्म - रंग - जाती आदि के आधार पर भेदभाव, सिर्फ़ अपने मज़े के लिए किसी इंसान या जानवर को परेशान करना और बहुत से काम शामिल है। वैसे आपने कभी इस बारे में सोचा है कि आपका फेका एक पॉलीथिन का टुकड़ा किस गाय-कुते या किसी मछली कि जिंदगी छीन सकता है, आपका उड़ाया मज़ाक या तो किसी को डिप्रेशन में कर सकता है या फिर उसे हिंसक प्रवृति का बना सकता है। 

                            अभी कुछ दिन पहले एक वीडियो काफ़ी वायरल हो रहा था जिसमें एक लड़की का स्कूटी पर ऐक्सिडेंट हुआ है और वो उसके सर से खून बह रहा है, सड़क पर लोग आ जा रहे है पर कोई उसे नहीं उठा रहा. फिर दो लोग आते है जो किसी मीडिया के थे वो भी उस लड़की का वीडियो बना रहे है अपने कैमरे से पर उसकी मदद नहीं की वो दर्द से छटपटा रही थी. साथ ही जिसने ये सारा वीडियो बनाया वो भी नहीं गया मदद करने, वो सिर्फ़ ये वीडियो बना के सोशल मीडिया पर डाल के खुद को फेमस करने के प्रयास में था। क्या सच में यही इंसानियत है ????? 

                                    बातें सब अच्छी अच्छी करते है, समाज में बढ़ती बुराइयों के बारे में। होता क्या है फिर???  मुझे नहीं पता आपमें से कितने लोग इस बात पर भरोसा करते है की इस संसार में सब चीज़े एक दूसरे से जुड़ी होती है, आपके किए कार्य ही आपके जीवन में अच्छे बुरे का संतुलन बनाते है। आपने अक्सर बड़े बूढों को कहते सुना होगा इंसान के कर्म ही आगे आते है, ये बात कितनी सच है ये सब हम जानते है। 

                                      आपका व्यवहार आपकी परवरिश दर्शाता है, आपकी आने वाली पीढ़ी भी आपको देख कर ही सीखेगी। आपको अच्छे बेहतर कल के लिए आज ही कोशिश करनी होगी, अपने लिए अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए। पर सवाल ये है की उस पीढ़ी को अच्छा सिखाने के लिए हम कितने सजग है?? विचार कीजिएगा कही देर न हो जाए..........

आखिर में कबीर के एक दोहे के साथ आप लोगों पर छोड़ता हूं की आप इस बात को कैसे लेते है। 

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, 
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

धन्यवाद 

:- 🖋️ मनीष पुंडीर 


Thursday, July 23, 2020

उम्मीद नहीं छोड़नी..

प्रयास कुछ बेहतर के लिए..... सबको खुश रहने का हक़ है,अपने दिल की कहने का हक़ है... बस इसी सोच को बढावा देने का ये प्रयास है.


               हम जिस समय मे जी रहे है यहा जल्दी सबको है.. सब अलार्म लगा के सोते है ,जल्दी जल्दी मे खाते है ,पर फिर भी जहा जाना होता है लेट ही पहुचते है। हर रात सोने के लिए हम नींद से नहीं  मोबाईल के चार्ज से लड़ते है जब वो कम हो जाता है तो फिर घड़ी मे 2 बज चुके होते है ,जमाना बदल गया है पहले बड़े बताते थे के वो इतनी मेहनत करते थे के नींद आराम से आती थी पर आज की पीड़ी यानि हम लोग जब जाग जाग के थक जाते है तब सो जाते है। इसी उम्मीद और वादे के साथ के कल से जल्दी मोबाईल साइड मे रखकर सो जाऊंगा,हम इतनी जल्दी मे रहते है उम्मीद भी बड़ी जल्दी छोड़ देते है।  
      

           समस्या सारी शुरू होती है हमारी सोच के साथ के हम जिसके पास हमसे बढ़कर होता है उसे खुद को जोड़ कर खुद को कोसते रहते है पर ये नहीं सोचते है कुछ वो लोग भी है जिनके पास वो भी नहीं जो हमारे पास है,अक्सर इंसान उस चीज की कदर नहीं करता जो आसानी से मिल जाती है जैसे परिवार और घर सुनने मे अजीब है पर सच है। हर कोई खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करता रहता है पर एक वक्त आता है जब हम कमजोर पड़ जाते उसी वक़्त मे उम्मीद नहीं छोड़नी,क्युकी जिंदगी भी आपको तब तक नहीं जीतने देगी जब तक वो जीतने की जिद नहीं रखोगे। 

        सबसे पूछो क्या हाल तो सब यही जवाब देते है बस कट रही है यार लाइफ काटने के लिए थोड़ी मिली है, हर किसी को कोई एक चाहिए होता है जिसे वो दिल का हाल बता सके और होना भी चाहिए वो खास कोई भी हो सकता आपके परिवार मे से कोई..आपका कोई दोस्त.. आपकी डायरी पर उन सभी बातों को अंदर पलने मत देना कभी कभी हम परेशानी से परेशान नहीं होते बस कोई वो बात सुनले तो सुकून मिल जाता है।ये आजकल व्हतसेप के स्टैटस मे आम हो गया है आजकल किसी ने किसी के लिए वो लगाया किसी और ने कुछ और समझ लिया, तो उस खास को संभाल कर रखिए और खुद को दूसरों से जोड़ के तोलना बंद कीजिय.. 


आखिर मे दो लाईने.. 

दूसरे के महलों को देख मे अपने मकान को कोसता रहा,
मेरे साथ परिवार था ,वो महलों मे अकेला परिवार को सोचता रहा॥ 
धूल मेरी आँखों मे थी और मै पागल बार बार आईना पोंछता रहा.. 


:-🖋 मनीष पुंडीर 




Wednesday, May 2, 2018

#जिंदगी

प्रयास कुछ बेहतर के लिए..... सबको खुश रहने का हक़ है,अपने दिल की कहने का हक़ है... बस इसी सोच को बढावा देने का ये प्रयास है.


#जिंदगी
जिंदगी में कई लोगों के लिए पैसा बहुत अहमियत रखता है कई तरक्की के पीछे भागते है पर
आखिर में एक सवाल उनसे पूछे कोई क्या वो सच मे खुश है ??मैंने कभी क्लास में फस्र्ट आने का नहीं सोचा पर कभी लास्ट भी नहीं रहा पर हाँ बहुत से कांड किये है जो आज भी यादों की तिज़ोरी मे महफूज़ है,मार भी खायी है मुर्गा भी बने प्रिंसिपल ने घरवालों को भी बुलाया।

जब हम स्कूल में होते है तो मार्क्स का डर फोर बोर्ड्स कॉलेज जॉब शादी सैटल लाइफ बस उम्र के साथ डर भी बढ़ता रहता है और आखिर में क्या होता है 'राम राम सत्य' बस यही सचाई है।आज जो पल है वहीं है कल क्या होगा किसे पता मैं कल को लेकर बुरा सोचने को नहीँ कह रहा पर कल के खाने का सोच के आज का खाना छोड़ दो ये कहा कि समझदारी है ??


जिंदगी बहुत से रंगों से जुड़ी है कभी अच्छी कभी बुरी सबके साथ है पर चलते रहने में जो मज़ा है वो किसी एक मोड़ पर ठहरने वाला नहीं समझेगा।
पैसे कमाओ पर ख़ुद को इतना मत ख़र्च करो के खोटा सिक्का हो जाओ और हर लम्हे को जियो क्योंकि कल कभी काश न हो।सबको अपनी अपनी दिक्कतें है पर आखिर में जिसके पास दिल की भड़ास निकल सको वो चार यार हमेशा रखना, क्योंकि तन्खा तो धीरे धीरे बढ़ ही जयेगी पर उम्र का सोचो जो बढ़ती जा रही है।
अपने अंदर का बच्चा मत मरने देना कभी...........

आजकल हर जगह लोगों के मन मे सवाल है के क्या हो रहा है चारो तरफ लड़ाई रेप खून वगैरा वगैरा पर आप किसी और की नज़रों से क्यों देखते हो दुनियां को??
अपने आसपास देखो बहुत से हँसते चहरे दिखेंगे, कभी किसी बच्ची को देख मासूमियत के इलावा कुछ आया है मन मे जब कोई बच्चा तुम्हे देख मुस्काने लगे तो चेहरा खिल उठता है।
तुम अकेले नहीं हो बहुत से तुमहारे जैसे भी है जो अच्छे होने का नाटक नही करते सच मे अच्छे है,माना कोई इतना अच्छा भी नही होता के कोई गलती न करे पर कोई इतना बुरा भी नही होता के उसे नफ़रत की नज़रों से देखने लगो।

धर्म जात ये सब स्कूल में नही सिखया गया था मुझे नहीँ फ़र्क पड़ता था कि मैं सलमान के साथ खा रहा हू या सोनू के साथ।दुनिया मे जितनी बुराई tv ओर अखबारों में दिखाई जा रही है वो पूरा सच नही है हम क्यों कुछ भी बिना सोचें समझे मान लेते है,किसी घटना पर दो बात बोल के दिल हल्का करना आसान है पर अपने आसपास की अच्छाई देखना उतना ही मुश्किल।


इच्छाओं की लिस्ट सैलरी स्लीप से ज़्यादा है माना पर इसका मतलब ये नहीं के हम अपने काम से नफ़रत करने लगे,जिनके पास काम नही उनसे पूछो??जितने अपने है उनके साथ वक़्त बिताओ खूब यादें बनाओ कल को बैंक की पासबुक तो प्रिंट हो जयेगी पर यादों की किताब कोरी रह जयेगी।

लोग कल भी यही थे आज भी यही है पर कल का क्या पता ?? तो आगे काश न कहना पड़े इसलिए आज में जियो।ज़रूरी नहीं के आपके efforts हमेशा कामयाब हो पर इसका मतलब ये तो नहीं न के आप क़ाबिल नहीं,हर बोल पर तो धोनी भी छक्का नही मरता यार।


तो बस यही कहूँगा जो आँखों से देखो उसपर यकीन करो जो महसूस हो वही सच है,बाकी सब मोह माया है क्योंकि मैंने हरी की जगह लाल चटनी भी खाई पर कृपा फिर भी नहीं आयी।
जनहित में अर्जी बाकी आपकी मर्जी
#mani

Friday, March 9, 2018

Parmotion of life

#तरक्की
कभी सोचता हूँ अकेले मैं बैठे कभी के क्या जिंदगी में तूने कमाया है,
जवाब एक ही मिलता है थोड़ा पाने के लिए तूने बहुत कुछ गवाया है।

न सुकून मिला न खुशि पर फ़िक्र ने उम्र भर साथ निभाया है,
किसे सुनाये अपनी हमने तो दूसरों की हस्सी के लिए खुद को सताया है।

न आंसू बचे न मुस्कान रही होंटो पर वक़्त किसका हुवा,
बड़ी देर लगी समझने में के गया समय कभी लौट के नहीं आया है।

कुछ चन्द पैसों के लिए मैंने कई अनमोल लम्हें खोये है,
सबकों हस्सी देकर अक्सर हम अकेले में खूब रोये है।

आगे बढ़ने के लिए असली खुद को कही दूर पीछे छोड़ आया हूँ,
अब तो दिखावे की दुनीया है जो पसंद है वहीँ लाया हूँ।

सबको वो सुनाया जो वो सुनना चाहते रहे,
अक्सर कुछ अपनों के लिए हम कुछ अपने गवाते रहे।

तरक्की इतनी हुई के अब अपने अंदर के बच्चे को मारके हम बड़े हो गए, 
मासूमियत का गाला दबा के चालाकी संग दोस्ती करके अपने पैरों पर खड़े हो गए।

:= मनीष पुंडीर

Monday, December 4, 2017

सर्दी की धूप

#सर्दी_कि_धूप 

 


तू सर्दी कि धूप सा छू जा मेरे ठन्डे पड़े एहसासों पर और उन्हें खुशनुमा करदे,
मै भी खिल जाऊ तेरी गर्माहट से जो तू मुझे बाहों में भरले।


गलत सही से परे सोच की उदेढ़ बुन छोड़ कभी मुझे वो पल दे जो किसी अच्छे बुरे के पैमानों से परे हो,
तेरे हसने की वजह...तेरे रूठने का अंदाज़...हो कुछ आदतें जिनपर सिर्फ हक मेरे हो।


किसी दिन रोक दू सारी कायनात जब तू मेरे साथ हो,मेरी आग़ोश में हो तू बेखोफ ऐसी भी एक रात हो...
 जब बातें बेफ़िज़ूल लगे और साँसों में बात हो,सारी शिकायतों का हिसाब हो ऐसी भी एक मुलाकात हो|


इस सर्दी मुकम्ल हो हमारी वो तन्हा काटी ठंड की रातों वाली हसरते......के सुध बाकि न रहे,
इस कदर हो संगम तेरा मेरा के मुझमे खो जाये तू........खुद में तू बाकि न रहे.

 :- मनीष पुंडीर






Thursday, November 30, 2017

जिंदगी

#lub_u_जिंदगी
खुश हूँ अपनी हैसीयत से जो भी कमाया जिंदगी में सब सचा मिला, 
हिसाब हमेशा बराबर रखा कुछ के साथ पक गया कुछ को मैं कच्चा मिला।

न आँसुओ की गिनती की न हँसी का हिसाब रखा, 
जो भी मिला उसे गले लगया अपनी आँखों में हमेशा दूसरों का ख़्वाब रखा।

कुछ अपने है जिनकी चिंता है कुछ का मलाल है जो अपने न हो सके, 
कुछ दोस्त है जिनकी वजह से होटो पर हँसी है तलाश एक कंधे की जिसपे हम रो सके।

कइयो का कर्ज़दार हूं ....तो कई लोंगो पर कुछ लमहों का उधार बाकि है, 
कुछ तक़दीर से आज भी साथ है कुछ की तस्वीरों संग याद बाकि है।

मसरूफ़  ज़माने में दो-चार हमे भी पहचानते है सुकून होता है इस बात का, 
दुनियादारी सीखा गए कुछ वरना यहाँ तो रुतबा है औकात का।

पता नहीं कौन सी प्रतियोगिता है कामयाबी का हिसाब अब यहाँ तनख्वा से तेय होता है, 
जिसके पास थोड़ा है उसके पास सपने है जिसके पास जेयादा है वो सुकून को रोता हैं। 

दो वक़्त की रोटी के चक्कर में वक़्त भूल के काम कर रहे है कुछ भूख से तो कुछ ज़्यादा खा के मर रहे है, 
फिर भी #lub_u_जिंदगी क्योंकि तुझे बेहतर बनाने के लिए हम आज भी ख़ुद से लड़ रहे है।
#mani

मैं श्रेष्ठ हूं

            अगर आपको अपनी आस्था पर भरोसा है और आप यह यकीन रखते हैं कि आपके किए गए अच्छे कर्म आपको पलट कर मिलेंगे, और आपने हर प्र...