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Thursday, October 8, 2020

समाज और समझ


              
ये सिर्फ़ एक लेख नहीं चीख है उन लोगों कि जो समाज के हिसाब से नहीं चलते तो उन्हें गलत कह दिया जात है। अपने यहां एक बहुत बड़ी समस्या है कि सबको अपने काम से मतलब नहीं है दूसरे क्या कर रहे है इसकी चिंता अधिक है।अपने घर में दिक्कतें चल रही हो पर परेशानी इस बात से है कि पड़ोस में लोग क्यों खुश है। 

                   सच कहूं तो ये एक मिथ्या भर है कि लोग क्या सोचेंगे अगर आप अपने हिसाब से चलेंगे तो, अब वो तो लोग सोचेंगे उन्हें ही करने दो क्यूंकि आप उनको खुश करने नहीं आए हो सबसे पहले ख़ुद की खुशी बहुत जरूरी है। इस बात को थोड़ा और समझते है अगर आजकल कोई लड़की खुली विचाधारा की है, सबसे हसीं खुशी बात करती है तो उसे चरित्र प्रमाण पत्र देने वाले खूब मिल जाएंगे।

                       हम आप बुरे नहीं है बुरे वो समाज के ठेकेदार जिन्हें अपनी बहु बेटियों का घुंघट तो प्यारा है, पर साथ ही अपने कार्यक्रम में लड़कियों से नाच करवा कर वो अपनी शान समझते है। ये फायदे के सगे है कब आपको धर्म,जात आपकी इज्ज़त का हवाला देकर अपना काम निकलवा लेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा। जिस दिन आप अपने अंदर से ये संकोच का भाव निकाल दोगे के समाज क्या सोचेगा, बस उसी दिन से जीवन में आधी दिक्कतें खत्म। 

                     हम कमज़ोर नहीं है हमारी मानसिकता कमज़ोर है, जो कभी हमें धर्म तो कभी जात के तराज़ू में बिठा देती है। पढ़ने में शायद अच्छा ना लगे पर ये घर से ही शुरू होता है, आपको पहले ही समझा दिया जाता है आपके दायरे क्या है।हमारे बड़ों कि ये समस्या है पहले वो हमे अच्छा पढ़ा लिखा देखना चाहते है, फिर हम अपनी पढ़ी लिखी विचारधारा को उनके सामने रखते है जिसमें कोई भेदभाव नहीं है तब वो हमें कहते है जायदा ही पढ़ लिख गया है जो हमें सीखा रहा है। 

:- मनीष पुंडीर 

Saturday, September 19, 2020

घर से दूरी.......


   
                   
         ये सच्चाई है के इंसान के पास अगर सब पहले से हो तो उसकी अहमियत नहीं रहती, जैसे आप एक ऐसे घर में पैदा हुए हो जहां तीन वक़्त का खाना और सर पर छत है तो उसका आभार रखिए। उन चीजों को अपनी किस्मत मान लेना, सही नहीं है क्युकी उसमें आपका योगदान कितना है वो अहमियत रखता है। 

                    घर से दूर रहना भी ज़रूरी है, आप वो सीखते है जो वहां रहकर नहीं सीखा जा सकता। अगर में आपसे ये बात कहूं के आपको एक बेहतर इंसान बनाने के लिए ये फायदेमंद है तो गलत नहीं होगा, घर से दूरी आपको बहुत कुछ सिखाती है। फिर चाहे वो शुरवात में अधपके चावल  हो या फ़िर वो कपड़े धोने का पहला अनुभव, आत्मनिर्भर बनने की पहली सीढ़ी यही है। कभी कभी आप हताश होते हो प्याज़ काटते वक़्त वो आंसू सिर्फ़ प्याज़ की वजह से नहीं होते, एक वक़्त तो सब बेमानी लगता है और घर जाना मोक्ष की भांति प्रतीत होता है। 

                   अनुभव की बात करू तो आप बहुत कुछ सीखते हो, जो सिर्फ़ खाना पकाने या कपड़े धोने तक सीमित नहीं है। ये दूरी आपके व्यक्तित्व को भी निखारती है, आपको नए अनुभव भी होते है जो कि आपको बेहतर इंसान बनने में सक्षम करते है। आप परिवार की अहमियत समझते है, पैसे की भी क़दर महीने के वो आखरी दस दिन सीखते है जब सिर्फ़ इंतज़ार होता है तनख़ा आने का इंतजार। आप दोस्त बनाते हो सही गलत का अनुभव भी करते हो, कुछ फ़ैसले गलत भी होते है जो आपकी समझ को और बढ़ाते है। 

             हिम्मत चाहिए होती है उन घर से दूर बढ़ते क़दमों में जब आप घर के लिए घर से दूर जा रहे होते हो, जिम्मेदारियों का बस्ता और उसमें ढेर सारे यादों के पल लिए निकल पड़ते है अपनी मंजिल की तलाश में। ये सुनने में जितना आसान लगता है उतना ही दिल मजबूत करना पड़ता है, ये बिल्कुल वैसा ही की किसी घने जंगल में आपको अकेला छोड़ दिया है। हर दिन एक नई कहानी होती है कभी कभी आप निराश होते है अकेलापन भी चुबता है, फ़िर आपको ही अपने आपको संभालना होता है आखिर में यही सच्चाई है।


            मेरा ये मानना है कि आपको आत्मनिर्भरता की सही परिभाषा समझनी है तो घर से दूर रहने का अनुभव एक बार जरूर ले, क्युकी ये आपको खुली छूट भी देगा और आपकी परवरिश को भी आजमाएगा। यकीन मानिए आज शायद जों घर में रहकर आपको सामान्य लग रहा है कि ये तो सबके पास होता है, उस "सामान्य" की अहमियत तब समझ आएगी। आपको जो मिला है उसका आभार रखिए और घर से दूर है तो मेरा सैल्यूट स्वीकार कीजिए, हर किसी के बस की बात नहीं होती ये निभाना बाकी तो सबका वक़्त गुजर ही जाना है...

:-🖋 मनीष पुंडीर 

Sunday, September 13, 2020

ज़ुबान

              ऐसी बानी बोलिए,मन का आपा खोय |
              औरन को शीतल करे,आपहु शीतल होय |


             ये बचपन में सबने पढ़ा होगा, पर आजतक कोई इसे सच में अपना पाया है??. सबके पास दूसरों को देने के लिए हज़ार सुझाव है,पर ख़ुद के लिए वो कितने लागू होते है यही समझने कि बात है। सब एक अच्छी जिंदगी चाहते है अपनी औकात को हैसियत में बदलने में जुटे है, पर आपका बर्ताव आपको बोली आपका मूल्य दर्शा देती है। आप जिस तरह से लोगों के साथ व्यवहार करते है,उससे आपकी परवरिश और आपका व्यक्तित्व उजागर हो जाता है। 
          
            इसके मूल को समझते ही आपकी बोली हर चीज़ में चार चांद लगा सकती है, फिर चाहे वो आपका काम हो या मेलभाव। कोई नहीं चाहता कि कोई उससे धुत्कारे या बात बात पर नीचा दिखाए, हमेशा याद रखिए दूसरों को हमेशा वैसे ही मिलिए - बोलिए जैसा आप चाहते है लोग आपसे बात करें। बड़े बूढ़े कह गए है "तलवार का घाव एक बार को भर सकता है, पर बोली का घाव कभी नहीं भरता", फिर चाहे वो गुस्से में बोले गए शब्द हो या किसी को जानबूझ कर आहत करने की मंशा। 

              बोलने की कला का अद्भुत उदाहरण आप महाभारत में कृष्ण जी से सीख सकते है, जिन्होंने बिना लड़े पांडवों को विजय दिलवाई। अपने आसपास देखंगे तो पाएंगे कि जिस किराने वाले की दुकान मोहल्ले में सबसे ज्यादा चलती है वो सबसे प्यार से बात करता है, कुछ लोग खुद ब खुद आपकी अच्छे लोगों की लिस्ट में अा जाते है क्युकी वो सिर्फ़ अच्छे से बात करते है। इसका सीधा सम्बन्ध आपकी सोच से होता है जैसा आप सोचते है वैसा ही आप दूसरों तक पहुंचाते है, ये प्राकृतिक है इसे आप बदल नहीं सकते। 

             अगर कभी मौका मिले तो अपनी दादी नानी या किसी भी बूढ़े इंसान के साथ बात करने की कोशिश करना, वो हमेशा आपको प्यार से बात करते हुवे मिलेंगे क्यूंकि वो जीवन के सारे अनुभव कर चुके है और वो समझते है बोली गई बातों की अहमियत। आपके बोली गई अच्छी बात क्या पता किसी की हिम्मत बन जाए, वहीं किसी का मज़ाक बना कर आप शायद किसी को डरपोक बना सकते है। जैसे जीवन एक है उसे अच्छे से बिताए तो मेरे दोस्त जुबान भी एक है अब उसे नमक बनाना है या शक्कर ये आप पर है........
             

:-🖊 मनीष पुंडीर 

Sunday, August 9, 2020

दुनियां हमसे कुछ बेहतर चाहती है.....

         
                                 आज के इस वक़्त में इंसान बदलाव तो चाहता है, पर ख़ुद को बदलना नहीं चाहता. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे सबको जाना स्वर्ग है, बस मरना कोई नहीं चाहता. एक जगह मैंने एक चीज़ पढ़ी थी आपके साथ भी बांट रहा हूं, जब सतयुग था तो अच्छाई और बुराई दोनों अलग अलग लोक में हुआ करती थी, अच्छे आदमी देव कहलाते थे और बुरे असुर इन्हीं से बना था देवलोक और असुरलोक. उसके बाद त्रेता युग की बात करे जिसमें अच्छाई और बुराई एक ही समाज का हिस्सा थे जैसे राम और रावण, फिर द्वापर युग आया जिसमें अच्छाई और बुराई एक ही कुटुंब का हिस्सा थे जैसे कौरव और पांडव। 

                                 अब आज के युग की बात करें तो ये है कलयुग अच्छाई और बुराई अब एक ही शरीर में है, यानी हम सबके अंदर और हम इस सच से भाग नहीं सकते। ये सब बताने की वज़ह जो है वो ये है की दुनियां में अच्छाई की कमी होती जा रही है, आप सिर्फ़ ये सोच के गलत करते है के सिर्फ़ मेरे अच्छा करने से क्या होगा?? तो दोस्त आप अपना योगदान तो दो बाकी अपना करेंगे। 

                                 आपकी इस छोटी छोटी अनदेखी से जाने कितने बड़े बड़े नुकसान होते है, आईए इसे और सरल तरीके से समझते है। इसमें आपका कूड़ा खुले में फेकना, नदी तालाब में गंदगी करना, किसी से धर्म - रंग - जाती आदि के आधार पर भेदभाव, सिर्फ़ अपने मज़े के लिए किसी इंसान या जानवर को परेशान करना और बहुत से काम शामिल है। वैसे आपने कभी इस बारे में सोचा है कि आपका फेका एक पॉलीथिन का टुकड़ा किस गाय-कुते या किसी मछली कि जिंदगी छीन सकता है, आपका उड़ाया मज़ाक या तो किसी को डिप्रेशन में कर सकता है या फिर उसे हिंसक प्रवृति का बना सकता है। 

                            अभी कुछ दिन पहले एक वीडियो काफ़ी वायरल हो रहा था जिसमें एक लड़की का स्कूटी पर ऐक्सिडेंट हुआ है और वो उसके सर से खून बह रहा है, सड़क पर लोग आ जा रहे है पर कोई उसे नहीं उठा रहा. फिर दो लोग आते है जो किसी मीडिया के थे वो भी उस लड़की का वीडियो बना रहे है अपने कैमरे से पर उसकी मदद नहीं की वो दर्द से छटपटा रही थी. साथ ही जिसने ये सारा वीडियो बनाया वो भी नहीं गया मदद करने, वो सिर्फ़ ये वीडियो बना के सोशल मीडिया पर डाल के खुद को फेमस करने के प्रयास में था। क्या सच में यही इंसानियत है ????? 

                                    बातें सब अच्छी अच्छी करते है, समाज में बढ़ती बुराइयों के बारे में। होता क्या है फिर???  मुझे नहीं पता आपमें से कितने लोग इस बात पर भरोसा करते है की इस संसार में सब चीज़े एक दूसरे से जुड़ी होती है, आपके किए कार्य ही आपके जीवन में अच्छे बुरे का संतुलन बनाते है। आपने अक्सर बड़े बूढों को कहते सुना होगा इंसान के कर्म ही आगे आते है, ये बात कितनी सच है ये सब हम जानते है। 

                                      आपका व्यवहार आपकी परवरिश दर्शाता है, आपकी आने वाली पीढ़ी भी आपको देख कर ही सीखेगी। आपको अच्छे बेहतर कल के लिए आज ही कोशिश करनी होगी, अपने लिए अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए। पर सवाल ये है की उस पीढ़ी को अच्छा सिखाने के लिए हम कितने सजग है?? विचार कीजिएगा कही देर न हो जाए..........

आखिर में कबीर के एक दोहे के साथ आप लोगों पर छोड़ता हूं की आप इस बात को कैसे लेते है। 

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, 
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

धन्यवाद 

:- 🖋️ मनीष पुंडीर 


Thursday, July 23, 2020

उम्मीद नहीं छोड़नी..

प्रयास कुछ बेहतर के लिए..... सबको खुश रहने का हक़ है,अपने दिल की कहने का हक़ है... बस इसी सोच को बढावा देने का ये प्रयास है.


               हम जिस समय मे जी रहे है यहा जल्दी सबको है.. सब अलार्म लगा के सोते है ,जल्दी जल्दी मे खाते है ,पर फिर भी जहा जाना होता है लेट ही पहुचते है। हर रात सोने के लिए हम नींद से नहीं  मोबाईल के चार्ज से लड़ते है जब वो कम हो जाता है तो फिर घड़ी मे 2 बज चुके होते है ,जमाना बदल गया है पहले बड़े बताते थे के वो इतनी मेहनत करते थे के नींद आराम से आती थी पर आज की पीड़ी यानि हम लोग जब जाग जाग के थक जाते है तब सो जाते है। इसी उम्मीद और वादे के साथ के कल से जल्दी मोबाईल साइड मे रखकर सो जाऊंगा,हम इतनी जल्दी मे रहते है उम्मीद भी बड़ी जल्दी छोड़ देते है।  
      

           समस्या सारी शुरू होती है हमारी सोच के साथ के हम जिसके पास हमसे बढ़कर होता है उसे खुद को जोड़ कर खुद को कोसते रहते है पर ये नहीं सोचते है कुछ वो लोग भी है जिनके पास वो भी नहीं जो हमारे पास है,अक्सर इंसान उस चीज की कदर नहीं करता जो आसानी से मिल जाती है जैसे परिवार और घर सुनने मे अजीब है पर सच है। हर कोई खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करता रहता है पर एक वक्त आता है जब हम कमजोर पड़ जाते उसी वक़्त मे उम्मीद नहीं छोड़नी,क्युकी जिंदगी भी आपको तब तक नहीं जीतने देगी जब तक वो जीतने की जिद नहीं रखोगे। 

        सबसे पूछो क्या हाल तो सब यही जवाब देते है बस कट रही है यार लाइफ काटने के लिए थोड़ी मिली है, हर किसी को कोई एक चाहिए होता है जिसे वो दिल का हाल बता सके और होना भी चाहिए वो खास कोई भी हो सकता आपके परिवार मे से कोई..आपका कोई दोस्त.. आपकी डायरी पर उन सभी बातों को अंदर पलने मत देना कभी कभी हम परेशानी से परेशान नहीं होते बस कोई वो बात सुनले तो सुकून मिल जाता है।ये आजकल व्हतसेप के स्टैटस मे आम हो गया है आजकल किसी ने किसी के लिए वो लगाया किसी और ने कुछ और समझ लिया, तो उस खास को संभाल कर रखिए और खुद को दूसरों से जोड़ के तोलना बंद कीजिय.. 


आखिर मे दो लाईने.. 

दूसरे के महलों को देख मे अपने मकान को कोसता रहा,
मेरे साथ परिवार था ,वो महलों मे अकेला परिवार को सोचता रहा॥ 
धूल मेरी आँखों मे थी और मै पागल बार बार आईना पोंछता रहा.. 


:-🖋 मनीष पुंडीर 




Wednesday, May 23, 2018

बचपन

#बचपन
आज हम उन पुरानी बातों को सोचते है अपना वो एग्जाम से पहले की रात की टेंशन, 
वो जन्मदिन से एक रात पहले वाली मन ही मन होती प्लानिंग और 
वो रात को चुपके से जाकर फ्रिज से एक बर्फी का टुकड़ा चुपचाप
 मुंह के डाल के वापस लेट जाना।


वो कुल्फी वाले की घंटी सुनते ही छुपाए हुवे सिक्के निकालना,
 वो अपनी नई पेंसिल सबको दिखाना और गलती पकड़े जाने पर वो मासूमियत भरा चेहरा।


सबका बचपन अलग अलग रहा है, पर अभी भी खुद को बड़ा मत होने दो जाने अनजाने
 आपके अंदर का वो बच्चा बाहर आ ही जाता है मानों या ना मानो.....


क्यों अक्सर बारिश देखते ही हाथ फैला के बूंदे महसूस करने को मन करता है, पार्क में लगे झूले.. 
कुल्फी और चाट के ठेले आज भी देख के मन खुश हो जाता है,
जब कोई फुटबॉल आपके पास आता है तो अपनेआप पाव शॉट लगाने को उतारू हो जाता है।


वो जो हस्सी खुद की पुरानी फोटो को देखकर निकलती है,
 वो जो शर्त किसकी राइटिंग जायदा अच्छी स्कूल में लगाई थी .... 
वो जो बोर्ड्स रिजल्ट के दिन आधी जान गले तक आयी थी।


बड़े जो अब हो गए है इस आगे बढ़ने की दौड़ में खो गए है,
अब इंक्रीमेंट की चिंता है और परफॉर्मेंस का भार है... 
अब तो दिन का भी फर्क नहीं पड़ता मंगल है या रविवार है।


पर ये इतनी तहजीब लेकर कहा जाओगे क्या अपने
 बच्चो को भी बस कॉम्पिटिशन और सर्वाइवल ही सिखाओगे, 
खुद के अंदर के बच्चे को जो मार के बैठे हो....
 बाहर निकालो न यार जो भी ख्वाहिश दिल में समेटे हो।



लिखने को बहुत है पर बड़े मशरूफ है आजकल के लोग, 
घड़ी सबके पास है बस वक़्त नहीं एक यही है रोग...


जो यहां तक पहुंचे  उनका ध्यनवाद बाकी
#लेखक फर्जी जनहित में अर्जी


#mani 

Wednesday, May 2, 2018

#जिंदगी

प्रयास कुछ बेहतर के लिए..... सबको खुश रहने का हक़ है,अपने दिल की कहने का हक़ है... बस इसी सोच को बढावा देने का ये प्रयास है.


#जिंदगी
जिंदगी में कई लोगों के लिए पैसा बहुत अहमियत रखता है कई तरक्की के पीछे भागते है पर
आखिर में एक सवाल उनसे पूछे कोई क्या वो सच मे खुश है ??मैंने कभी क्लास में फस्र्ट आने का नहीं सोचा पर कभी लास्ट भी नहीं रहा पर हाँ बहुत से कांड किये है जो आज भी यादों की तिज़ोरी मे महफूज़ है,मार भी खायी है मुर्गा भी बने प्रिंसिपल ने घरवालों को भी बुलाया।

जब हम स्कूल में होते है तो मार्क्स का डर फोर बोर्ड्स कॉलेज जॉब शादी सैटल लाइफ बस उम्र के साथ डर भी बढ़ता रहता है और आखिर में क्या होता है 'राम राम सत्य' बस यही सचाई है।आज जो पल है वहीं है कल क्या होगा किसे पता मैं कल को लेकर बुरा सोचने को नहीँ कह रहा पर कल के खाने का सोच के आज का खाना छोड़ दो ये कहा कि समझदारी है ??


जिंदगी बहुत से रंगों से जुड़ी है कभी अच्छी कभी बुरी सबके साथ है पर चलते रहने में जो मज़ा है वो किसी एक मोड़ पर ठहरने वाला नहीं समझेगा।
पैसे कमाओ पर ख़ुद को इतना मत ख़र्च करो के खोटा सिक्का हो जाओ और हर लम्हे को जियो क्योंकि कल कभी काश न हो।सबको अपनी अपनी दिक्कतें है पर आखिर में जिसके पास दिल की भड़ास निकल सको वो चार यार हमेशा रखना, क्योंकि तन्खा तो धीरे धीरे बढ़ ही जयेगी पर उम्र का सोचो जो बढ़ती जा रही है।
अपने अंदर का बच्चा मत मरने देना कभी...........

आजकल हर जगह लोगों के मन मे सवाल है के क्या हो रहा है चारो तरफ लड़ाई रेप खून वगैरा वगैरा पर आप किसी और की नज़रों से क्यों देखते हो दुनियां को??
अपने आसपास देखो बहुत से हँसते चहरे दिखेंगे, कभी किसी बच्ची को देख मासूमियत के इलावा कुछ आया है मन मे जब कोई बच्चा तुम्हे देख मुस्काने लगे तो चेहरा खिल उठता है।
तुम अकेले नहीं हो बहुत से तुमहारे जैसे भी है जो अच्छे होने का नाटक नही करते सच मे अच्छे है,माना कोई इतना अच्छा भी नही होता के कोई गलती न करे पर कोई इतना बुरा भी नही होता के उसे नफ़रत की नज़रों से देखने लगो।

धर्म जात ये सब स्कूल में नही सिखया गया था मुझे नहीँ फ़र्क पड़ता था कि मैं सलमान के साथ खा रहा हू या सोनू के साथ।दुनिया मे जितनी बुराई tv ओर अखबारों में दिखाई जा रही है वो पूरा सच नही है हम क्यों कुछ भी बिना सोचें समझे मान लेते है,किसी घटना पर दो बात बोल के दिल हल्का करना आसान है पर अपने आसपास की अच्छाई देखना उतना ही मुश्किल।


इच्छाओं की लिस्ट सैलरी स्लीप से ज़्यादा है माना पर इसका मतलब ये नहीं के हम अपने काम से नफ़रत करने लगे,जिनके पास काम नही उनसे पूछो??जितने अपने है उनके साथ वक़्त बिताओ खूब यादें बनाओ कल को बैंक की पासबुक तो प्रिंट हो जयेगी पर यादों की किताब कोरी रह जयेगी।

लोग कल भी यही थे आज भी यही है पर कल का क्या पता ?? तो आगे काश न कहना पड़े इसलिए आज में जियो।ज़रूरी नहीं के आपके efforts हमेशा कामयाब हो पर इसका मतलब ये तो नहीं न के आप क़ाबिल नहीं,हर बोल पर तो धोनी भी छक्का नही मरता यार।


तो बस यही कहूँगा जो आँखों से देखो उसपर यकीन करो जो महसूस हो वही सच है,बाकी सब मोह माया है क्योंकि मैंने हरी की जगह लाल चटनी भी खाई पर कृपा फिर भी नहीं आयी।
जनहित में अर्जी बाकी आपकी मर्जी
#mani

Friday, March 9, 2018

Parmotion of life

#तरक्की
कभी सोचता हूँ अकेले मैं बैठे कभी के क्या जिंदगी में तूने कमाया है,
जवाब एक ही मिलता है थोड़ा पाने के लिए तूने बहुत कुछ गवाया है।

न सुकून मिला न खुशि पर फ़िक्र ने उम्र भर साथ निभाया है,
किसे सुनाये अपनी हमने तो दूसरों की हस्सी के लिए खुद को सताया है।

न आंसू बचे न मुस्कान रही होंटो पर वक़्त किसका हुवा,
बड़ी देर लगी समझने में के गया समय कभी लौट के नहीं आया है।

कुछ चन्द पैसों के लिए मैंने कई अनमोल लम्हें खोये है,
सबकों हस्सी देकर अक्सर हम अकेले में खूब रोये है।

आगे बढ़ने के लिए असली खुद को कही दूर पीछे छोड़ आया हूँ,
अब तो दिखावे की दुनीया है जो पसंद है वहीँ लाया हूँ।

सबको वो सुनाया जो वो सुनना चाहते रहे,
अक्सर कुछ अपनों के लिए हम कुछ अपने गवाते रहे।

तरक्की इतनी हुई के अब अपने अंदर के बच्चे को मारके हम बड़े हो गए, 
मासूमियत का गाला दबा के चालाकी संग दोस्ती करके अपने पैरों पर खड़े हो गए।

:= मनीष पुंडीर

Monday, February 26, 2018

फ़ुरसत

#फुरसत
बड़ी मशरूफ है जिंदगी अब उसे मेरे लिए फुरसत नहीं मिलती, 
पहले जो ख़्याल से भी खुश थे अब तो यादों से भी राहत नहीं मिलती।

ना जाने कितने मन मारे हमने भी कुछ जिम्मेदारियों की यारी में, 
कट रही है अपनी भी आधी कमाने में बाकी उधारी में।

कभी बहाने लगा कर ख्वाहिशों को फुसला लिया,
तो कभी वक़्त का बता के दिल को समझा लिया।

सही मौके के चक्कर में मौके खोता गया,
दुनियादारी की दौड़ में मै भी समझदार होता गया।

कुछ को शिकायतें है तो कुछ मलाल लिए बैठे है,
 बहुत थे अरमान मेरे भी कुछ मान गए कुछ अभी भी ऐठे है।
:=मनीष पुंडीर

Monday, January 29, 2018

#दो_पल

#दो_पल
मिले दो पल फूसरत के तो मिलू बिछड़े यारों से, 
मिले दो पल की मोहलत तो हिसाब हो अधूरे वादों से।  

मिले दो पल वो बचपन के तो फिर बीफिक्र हो जाऊ मैं,
मिले दो पल वो मां का आंचल फिर चेन से सो जाऊं मैं।

मिले जो दो पल वो सुकून के तो पापा संग साइकिल की सैर हो,
आए फिर वो रविवार जब आंख खुले तो दुपहर हो।

मिले दो पल उस मुलाकात के जब अधूरी बाते पूरी हो,
मिले दो पल ऐसे भी जब कोई ना मजबूरी हो।

मिले दो पल वो मन की करू ना समझाना पड़े जमाने को,
मिले दो पल मुझे खुशी बिना परेशा किए किसी बहाने को।


इन्हीं दो पल के इंतज़ार में जिंदगी खर्च हो रही है, 
उम्मीद जागी हुई है बस किस्मत सो रही है।

#mani

Thursday, December 28, 2017

#हो_कोई_ऐसा??

प्रयास कुछ बेहतर के लिए..... सबको खुश रहने का हक़ है,अपने दिल की कहने का हक़ है... बस इसी सोच को बढावा देने का ये प्रयास है.


#हो_कोई_ऐसा??
 
हो कोई ऐसा जिसे हम अपना कहें ,
चाहें हो जितनी भी दूरी पर वो हर वक़्त ख्यालो में रहे..

जिसकी हस्सी की वजह बने को मन करे,
जिसके एक रिप्लाई को हम अपनी निंदो से बगावत करे...

जिसके गले लगने से सुकून का एहसास हो,
कोई हो ऐसा एक जिसके लिए सिर्फ आप खास हो।

जिसके ख्याल तकिये पर रख खुली आँखो से सपने आये,
जिसकी एक गुड मॉर्निंग से आपका पूरा दिन बन जाये।

हो एक ऐसा भी यार जो तेरी बातों  को अच्छे-बुरे के तराज़ू में न तोले,
जिसके साथ वक़्त का होश न हो....जो समझे इशारों की भी जुबान बिन बोले।

जिसके लिए वक़्त से और मोहलत मांगने को मन करे,
जिसे दिल की हो बातें सारी और जिसे देख देख आँखों की नियत न भरे।

जिसको रत 3 बजे आंख खुलने पर कॉल करने से पहले सोचना न पड़े,
हो कोई ऐसा जो अपनी हर फ़िक्र में तुम्हारा ही जिक्र करे.......

अगर है कोई ऐसा तो खुश रखना उसे क्युकी खुसनसीब हो तुम........

#mani

Saturday, December 16, 2017

हसरतें

#हसरते
  लाखों हसरते है ऐसी के न बताई जाये न दबाई जाये, दुनियां बड़ी चंट न समझ आये और न अपनी किसी को समझाई जाये.....

परिंदा बन उड़ने को मन खूब ज़िद तो करता है,पर मज़बूरी शिकार खूब जानती है ये बात इसे कैसे समझाई जाये ??

नदी किनारें सभी अहसासों का  एक दिन में हिसाब करूँगा , लहरें पैरों को छूकर फिर लौट जायेगी पर मैं नही माफ़ करूँगा।।

आईने में देख खुद को आँखों में बचपन टटोलता हूँ, अक़्सर अधुरी ख्वाइशों का बोझ लेकर तकिए पर सोता हूं।।

इस शहर के शोर से दूर कही दूर बस जाऊ जहाँ दिए के उजाले में आज भी दादी-नानी सर सहलाये, बारिश के पानी में कस्ती अपनी बढ़ाये आज फिर किसी बगीचे से आम तोड़ के खाये।।

कुछ है मेरी हसरतें जो पैसे से कीमती है बेचूँगा किसी दिन इन्हें कोई ख़रीदार मिला तो, पर फिर मन ये पूछे मुझसे इन दो कौड़ी के जज़्बातों की क्या कीमत लगाई जाए ??

वैसे मेरे अपने कहते है हँसना भूल गया हूं मैं अब उन्हें क्या वजह बताई जाये, मेरे यारों खुश हूँ तुम हो बस ख़ुद से खफ़ा हूं अब छोड़ो यार क्या नाराजगी जताई जाये।।

#मनीष पुंडीर

मैं श्रेष्ठ हूं

            अगर आपको अपनी आस्था पर भरोसा है और आप यह यकीन रखते हैं कि आपके किए गए अच्छे कर्म आपको पलट कर मिलेंगे, और आपने हर प्र...